22 जुलाई से शुरू होगी चौखम्भा की पावन तलहटी तक मनणामाई की पांच दिवसीय लोकजात यात्रा, 32 किमी की पदयात्रा में उमड़ेगी आस्था,

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रासी गांव से होगा शुभारंभ, सावन में सदियों पुरानी परंपरा निभाने जुटेंगे हजारों श्रद्धालु और भेड़ पालक समुदाय,

ऊखीमठ/रुद्रप्रयाग। हिमालय की दिव्य गोद में स्थित चौखम्भा पर्वत की पावन तलहटी और मदानी नदी के निर्मल तट तक पहुंचने वाली मां मनणामाई की पांच दिवसीय पारंपरिक लोकजात यात्रा का शुभारंभ आगामी 22 जुलाई से होगा। करीब 32 किलोमीटर लंबी यह ऐतिहासिक पदयात्रा भगवती राकेश्वरी की तपस्थली रासी गांव से विधि-विधान, वैदिक मंत्रोच्चार और पारंपरिक पूजा-अर्चना के साथ प्रारंभ होगी। यात्रा को लेकर पूरे मद्महेश्वर घाटी क्षेत्र में धार्मिक उल्लास और भक्ति का माहौल है, जबकि तैयारियां अंतिम चरण में पहुंच चुकी हैं।

 

सदियों से सावन माह में आयोजित होने वाली यह लोकजात यात्रा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि उत्तराखंड की समृद्ध लोक संस्कृति, हिमालयी परंपराओं और भेड़ पालक समुदाय की अटूट आस्था का जीवंत प्रतीक मानी जाती है। यात्रा के दौरान मां मनणामाई की डोली पारंपरिक वाद्ययंत्रों, जयकारों और धार्मिक अनुष्ठानों के बीच निर्धारित पड़ावों से होते हुए चौखम्भा की पवित्र तलहटी तक पहुंचेगी।

 

लोकमान्यता के अनुसार मां मनणामाई ने चौखम्भा की तलहटी और मदानी नदी के तट पर कठोर तप कर लोककल्याण, प्रकृति संरक्षण तथा पशुधन की रक्षा का वरदान दिया था। इसी कारण भेड़ पालक समुदाय उन्हें अपनी आराध्य देवी के रूप में श्रद्धापूर्वक पूजता है। यात्रा में शामिल श्रद्धालु देवी से क्षेत्र में सुख-समृद्धि, अच्छी वर्षा, भरपूर कृषि उत्पादन, पशुधन की वृद्धि और जनकल्याण का आशीर्वाद मांगते हैं।

 

पांच दिनों तक चलने वाली इस कठिन पदयात्रा में मद्महेश्वर घाटी सहित जनपद के विभिन्न क्षेत्रों से हजारों श्रद्धालु, स्थानीय ग्रामीण, भेड़ पालक समुदाय और देवी भक्त भाग लेंगे। यात्रा को सफल बनाने के लिए स्थानीय युवक मंगल दल, महिला मंगल दल और ग्रामीण संगठन भी पूरे उत्साह के साथ व्यवस्थाओं में जुटे हुए हैं।

 

राकेश्वरी मंदिर समिति के पूर्व अध्यक्ष जगत सिंह पंवार ने बताया कि लोकजात यात्रा के सफल संचालन के लिए सभी आवश्यक व्यवस्थाएं सुनिश्चित की जा रही हैं। उन्होंने श्रद्धालुओं से धार्मिक मर्यादाओं का पालन करने, स्वच्छता बनाए रखने तथा हिमालयी पर्यावरण की रक्षा में सहयोग देने की अपील की। उन्होंने कहा कि मनणामाई लोकजात यात्रा हमारी सांस्कृतिक विरासत और लोक आस्था की अमूल्य धरोहर है, जिसे सुरक्षित रखना हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है।

 

शिक्षाविद रविन्द्र भट्ट ने कहा कि मनणामाई लोकजात यात्रा धार्मिक महत्व के साथ-साथ हिमालयी लोकजीवन, प्रकृति और संस्कृति के अद्भुत समन्वय का भी अनुपम उदाहरण है। यह यात्रा हर वर्ष सामाजिक एकता, लोक परंपराओं और आध्यात्मिक चेतना को नई ऊर्जा प्रदान करती है। श्रद्धालुओं का अटूट विश्वास है कि मां मनणामाई की कृपा से क्षेत्र में सुख, शांति, समृद्धि और जनकल्याण का मार्ग सदैव प्रशस्त होता है।