शंख ध्वनि के निमंत्रण के साथ धाम पहुंची बाबा की डोली, वैदिक रीति-रिवाज से खुले मदमहेश्वर धाम के कपाट

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प्रवीन रावत।प्रधान संपादक।।


रुद्रप्रयाग। गढ़वाल हिमालय के सुप्रसिद्ध पंचकेदारों में द्वितीय केदार नाम से विश्व विख्यात भगवान मदमहेश्वर धाम के कपाट  विधि-विधान और वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ खोल दिए गए हैं। इस पावन और अलौकिक अवसर के गवाह बनने के लिए धाम में हजारों की संख्या में श्रद्धालु मौजूद थें। कपाट खुलने के बाद देर शाम तक भक्तों के आने का सिलसिला लगातार जारी रहा।
गुरुवार को सूबह ब्रह्म बेला में गौण्डार गांव में मदमहेश्वर धाम के प्रधान पुजारी शिव शंकर लिंग ने पंचांग पूजन के तहत अनेक धार्मिक अनुष्ठान संपन्न की। इस दौरान उन्होंने भगवान मदमहेश्वर सहित तैंतीस कोटि देवी-देवताओं की पूजा की गई। ठीक प्रातः पांच बजे बाबा की चल विग्रह उत्सव डोली का भव्य श्रृंगार कर विधि-विधान से आरती उतारी गई, जिसके बाद डोली ने गौण्डार गांव से धाम के लिए प्रस्थान किया।
 

यात्रा पड़ावों पर हुआ भव्य स्वागत
रुद्रप्रयाग। डोली के प्रस्थान करते ही समूची घाटी जय बाबा मदमहेश्वर और हर-हर महादेवश् के उद्घोष से गुंजायमान हो उठी। विभिन्न यात्रा पड़ावों पर स्थानीय ग्रामीणों और देश-विदेश से आए भक्तों ने पुष्प और अक्षत वर्षा कर डोली की भव्य अगुवाई की। श्रद्धालुओं ने बाबा को लाल-पीले वस्त्र अर्पित कर सुख-समृद्धि की मनौतियां मांगी। भक्तों को आशीर्वाद देते हुए डोली देव दर्शनी पहुंची, जहां डोली ने कुछ देर विश्राम किया।

 

शंख ध्वनि से दिया गया धाम आने का निमंत्रण
रुद्रप्रयाग। ठीक सुबह 11 बजे एक बेहद भावुक और पारंपरिक दृश्य देखने को मिला। मदमहेश्वर धाम के भंडारी मदन सिंह पंवार और विशाम्बर पंवार ने धाम से शंख ध्वनि देकर डोली को धाम आने का पारंपरिक निमंत्रण दिया। डोली के साथ चल रहे भक्तों ने भी प्रत्युत्तर में शंख बजाकर इस निमंत्रण को सहर्ष स्वीकार किया, जिसके बाद डोली मुख्य धाम के लिए रवाना हुई।

 

तीन परिक्रमा के बाद सवा ग्यारह बजे खुले कपाट
रुद्रप्रयाग। मदमहेश्वर धाम पहुंचने पर भगवान की चल विग्रह उत्सव डोली ने सबसे पहले मुख्य मंदिर की तीन परिक्रमा की। इसके ठीक बाद, सुबह सवा ग्यारह बजे वैदिक रीति-रिवाज और मंत्रोच्चारण के बीच मुख्य मंदिर के कपाट श्रद्धालुओं के दर्शनार्थ खोल दिए गए। 
 

धाम पहुंचते ही डोली ने किया तांबे के बर्तनों का निरीक्षण
रुद्रप्रयाग। द्वितीय केदार भगवान मदमहेश्वर की कपाट उद्घाटन प्रक्रिया के दौरान एक बेहद अनूठी और पौराणिक परंपरा का निर्वहन किया जाता है। शीतकालीन गद्दीस्थल ओंकारेश्वर मंदिर उखीमठ से प्रस्थान कर जब बाबा मदमहेश्वर की भव्य चल विग्रह उत्सव डोली अपने धाम पहुंचती है, तो सबसे पहले मंदिर के तांबे के प्राचीन बर्तनों (भंडारे के पात्रों) का बारीकी से निरीक्षण किया जाता है। मान्यताओं और परंपरा के अनुसार, डोली के मुख्य मंदिर परिसर में प्रवेश करते ही हक-हकूकधारियों और देव-निशानों की मौजूदगी में इन बर्तनों को बाहर निकाला जाता है। बाबा की डोली स्वयं इन बर्तनों के समीप जाकर मानो उनकी शुचिता, संख्या और व्यवस्था का जायजा लेती है। इस अलौकिक दृश्य को देखने के लिए धाम में मौजूद सैकड़ों श्रद्धालुओं की आंखें श्रद्धा से नम हो जाती हैं। ग्रामीणों और जानकारों के मुताबिक, यह परंपरा सदियों से चली आ रही है जो मंदिर की व्यवस्थाओं में शुचिता, पारदर्शिता और बाबा के सीधे नियंत्रण को दर्शाती है। इस निरीक्षण के संपन्न होने और सब कुछ सही पाए जाने के बाद ही कपाट खुलने की अगली धार्मिक प्रक्रियाएं विधि-विधान से शुरू की जाती हैं।
 

भगवान मदमहेश्वर धाम में होती है शिव के मध्य भाग की पूजा
रुद्रप्रयाग। पंचकेदारों में द्वितीय केदार के रूप में पूजनीय भगवान मदमहेश्वर धाम की महिमा अद्वितीय है। चैखंबा शिखर के पाद-मूल में समुद्र तल से लगभग 11,473 फीट की ऊंचाई पर स्थित इस पावन धाम का सीधा संबंध महाभारत काल से है।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, कुरुक्षेत्र युद्ध के बाद गोत्र हत्या के पाप से मुक्ति के लिए पांडव भगवान शिव की खोज में हिमालय आए थे। गुप्तकाशी में पांडवों को देखकर भगवान शिव ने महिष (भैंसे) का रूप धारण कर लिया था। जब भीम ने उन्हें पहचान कर पकड़ना चाहा, तो वे धरती में अंतर्ध्यान हो गए। इसके बाद उनके शरीर के विभिन्न भाग पांच अलग-अलग स्थानों पर प्रकट हुए, जिन्हें पंचकेदारश् कहा जाता है। मदमहेश्वर धाम में भगवान शिव के विग्रह के मध्य भाग (नाभि क्षेत्र) की पूजा-अर्चना की जाती है।

केदारघाटी में न्याय के देवता के रूप में पूजे जाते हैं बाबा मदमहेश्वर
रुद्रप्रयाग। बाबा मदमहेश्वर न केवल आध्यात्मिक शांति के केंद्र हैं, बल्कि संपूर्ण केदारघाटी में उन्हें न्याय के देवता के रूप में भी सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। स्थानीय जनमानस में बाबा मदमहेश्वर के प्रति अटूट आस्था है और माना जाता है कि उनके दरबार से कोई भी पीड़ित खाली हाथ नहीं लौटता। केदारघाटी के ग्रामीण क्षेत्रों में सदियों से यह परंपरा चली आ रही है कि जब किसी व्यक्ति को कहीं से न्याय नहीं मिलता या कोई आपसी विवाद जटिल हो जाता है, तो लोग बाबा मदमहेश्वर की शरण में पहुंचते हैं। स्थानीय भाषा में इसे न्याय की गुहार लगाना कहा जाता है। मान्यता है कि बाबा के दरबार में सच्चाई को छुपाया नहीं जा सकता और जो भी दोषी होता है, उसे बाबा के न्याय का सामना करना ही पड़ता है। मदमहेश्वर घाटी के गांवों में आज भी कई सामाजिक और व्यावहारिक मामलों का निपटारा बाबा की आज्ञा और उनके प्रतीकों को साक्षी मानकर किया जाता है। स्थानीय लोग कानूनी अदालतों से ज्यादा बाबा मदमहेश्वर के न्याय पर भरोसा करते हैं।