64 योगिनियों का दिव्य क्षेत्र, शिला पर मां के चरण चिह्न होने की मान्यता, कच्चा दूध, फल-फूल और पंचमेवा से होती है पूजा, सात्विक साधना के लिए विख्यात है शक्तिपीठ
रोहित डिमरी
रुद्रप्रयाग। उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जनपद की ऊखीमठ घाटी में हिमालय की गोद में स्थित महा सिद्धपीठ मां कालीशिला आस्था, अध्यात्म, पौराणिक मान्यताओं और प्राकृतिक दिव्यता का अद्भुत संगम है। समुद्र तल से लगभग 2,300 मीटर से अधिक की ऊंचाई पर स्थित यह पवित्र स्थल अपनी विशिष्ट धार्मिक परंपराओं, रहस्यमयी मान्यताओं और साधना की महत्ता के लिए विशेष पहचान रखता है। मान्यता है कि मां भगवती के इस दिव्य धाम में सच्चे मन, श्रद्धा और विश्वास के साथ पहुंचने वाले भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। यही कारण है कि कालीशिला केवल एक तीर्थस्थल नहीं, बल्कि श्रद्धालुओं के लिए अटूट विश्वास और आध्यात्मिक अनुभूति का केंद्र है।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, शुंभ, निशुंभ और रक्तबीज जैसे असुरों के अत्याचारों से मुक्ति दिलाने के लिए मां भगवती ने दिव्य स्वरूप धारण किया था। मान्यता है कि मां कालीशिला में 12 वर्षीय बालिका के रूप में कौशिक स्वरूप में प्रकट हुईं और इसके बाद महाकाली का उग्र रूप धारण किया। इसी क्षेत्र की दिव्य शिला को मां की लीलाओं और दैवीय शक्ति से जोड़कर देखा जाता है। श्रद्धालुओं की आस्था है कि शिला पर मां के चरण चिह्न विद्यमान हैं। यह मान्यता इस स्थल की धार्मिक महत्ता को और विशेष बनाती है।
महा सिद्धपीठ कालीशिला की महिमा से जुड़ी एक महत्वपूर्ण मान्यता पटियाला के महाराजा भूपेंद्र सिंह की तपस्या से संबंधित है। स्थानीय धार्मिक परंपरा के अनुसार, 150 साल पहले महाराजा भूपेंद्र सिंह ने पुत्र प्राप्ति की कामना से इस पवित्र स्थल पर तपस्या की थी। मान्यता है कि उनकी मनोकामना मां भगवती की कृपा से पूर्ण हुई। इस प्रसंग को कालीशिला की सिद्ध महिमा और श्रद्धालुओं के विश्वास के उदाहरण के रूप में बताया जाता है।
इस मान्यता के चलते कालीशिला का महत्व केवल स्थानीय श्रद्धालुओं तक सीमित नहीं माना जाता, बल्कि इसे दूर-दराज से आने वाले भक्तों की आस्था से भी जोड़ा जाता है। हालांकि, इस प्रसंग की ऐतिहासिक पुष्टि के लिए स्वतंत्र ऐतिहासिक दस्तावेजों का उल्लेख आवश्यक है। धार्मिक मान्यताओं में इसे मां की कृपा और तपस्या के फल से जोड़कर स्मरण किया जाता है।
यहां नहीं चढ़ता पका हुआ भोजन, कच्चा दूध और पंचमेवा है विशेष,
रूद्रप्रयाग। मां कालीशिला की पूजा पद्धति इस तीर्थस्थल की विशिष्ट पहचान है। यहां मां को गाय का कच्चा दूध, फल-फूल और पंचमेवा अर्पित करने की परंपरा बताई जाती है। मान्यता के अनुसार, इस स्थल पर पका हुआ भोजन नहीं चढ़ाया जाता। पूजा-अर्चना में सात्विकता, पवित्रता और धार्मिक मर्यादाओं का विशेष ध्यान रखा जाता है। यहां की परंपरा श्रद्धालुओं को सादगी और शुद्ध भाव से मां की आराधना करने का संदेश देती है। भक्त अपनी सामर्थ्य और श्रद्धा के अनुसार मां के दरबार में पहुंचकर पूजा करते हैं और परिवार की सुख-समृद्धि, स्वास्थ्य तथा जीवन की मंगलकामनाओं के लिए प्रार्थना करते हैं।

कालीमठ और कालीशिला की साधना की परंपराओं में अंतर,
धार्मिक मान्यता के अनुसार, कालीमठ और कालीशिला की साधना परंपराओं में अंतर है। कालीमठ में मां काली के विग्रह के स्थान पर श्रीयंत्र की पूजा की जाती है, जबकि कालीशिला को सात्विक आराधना के प्रमुख स्थल के रूप में देखा जाता है। यहां साधना के दौरान आचरण की शुद्धता और धार्मिक मर्यादा को महत्वपूर्ण माना जाता है। हिमालय की शांत वादियों में स्थित यह दिव्य शक्तिस्थल आस्था, साधना और प्रकृति के अद्भुत संगम का अनुभव कराता है। मां भगवती के कौशिक स्वरूप की मान्यता, महाराजा भूपेंद्र सिंह की तपस्या से जुड़ा प्रसंग और यहां की विशिष्ट सात्विक पूजा परंपरा कालीशिला को उत्तराखंड के महत्वपूर्ण धार्मिक स्थलों में एक विशेष स्थान प्रदान करती है।
64 योगिनियों का क्षेत्र, सात्विक साधना की विशेष पहचान
रूद्रप्रयाग। कालीशिला क्षेत्र को 64 योगिनियों और दिव्य यंत्रों से जुड़ा सिद्धस्थल माना जाता है। यहां की आध्यात्मिक परंपराएं लंबे समय से साधकों और श्रद्धालुओं को आकर्षित करती रही हैं। पिछले 26 वर्षों से मां काली के कौशिक स्वरूप की पूजा-अर्चना कर रहे सिद्ध बाबा बरखा गिरि महाराज के नाती-शिष्य थानापति मणि महेश गिरी महाराज के अनुसार, कालीशिला में सात्विक साधना और धार्मिक नियमों के पालन का विशेष महत्व है।

हिमालय की दिव्य चोटियां बढ़ाती हैं इस धाम की भव्यता,
रूद्रप्रयाग।
कालीशिला की विशेषता केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है। मौसम साफ रहने और दृश्यता अनुकूल होने पर यहां से सुमेरु पर्वत, चौखंबा, मद्महेश्वर, बूढ़ा मद्महेश्वर, तुंगनाथ, कार्तिक स्वामी, त्रियुगीनारायण, नंदी कुंड और पांडव सेरा क्षेत्र की मनोरम प्राकृतिक छटा दिखाई देने की बात कही जाती है। हिमालय की विशाल पर्वत शृंखलाओं के बीच स्थित यह क्षेत्र श्रद्धालुओं के साथ प्रकृति प्रेमियों को भी आकर्षित करता है।
श्रद्धा, विश्वास और आध्यात्मिक अनुभूति का केंद्र,
रूद्रप्रयाग।
महा सिद्धपीठ मां कालीशिला की महिमा यहां प्रचलित पौराणिक कथाओं, विशिष्ट पूजा परंपराओं और श्रद्धालुओं के अनुभवों में रची-बसी है। भक्तों का विश्वास है कि जो भी व्यक्ति निर्मल मन, सच्ची श्रद्धा और निष्ठा के साथ मां के दरबार में पहुंचता है, उसे आध्यात्मिक शांति और मनोकामना पूर्ति की आशा मिलती है।
कालीशिला जाने के लिए मार्ग
रूद्रप्रयाग। कालीशिला मंदिर जाने के लिए गुप्तकाशी से कालीमठ मार्ग से जग्गी बगवान और ब्यूंखी तक वाहन से पहुंचकर 2 से 3 किमी की पैदल दूरी तय करने के बाद पहुंच सकते हैं। मां कालीशिला का दिव्य स्थल कालीमठ मंदिर से ठीक ऊपर देखने पर साफ दिखाई देता है। मां काली की शिला दिव्य रूप में भक्तों को आशीर्वाद देती है।


